ऐ भाई ज़रा देख के चलो !
आज मैं पुराने ज़माने के गाने सुनने बैठी. क्या ख़ूब बोल हुआ करते थे पहले!
घूमते-घामते फ़िल्म इंडस्ट्री के शोमैन राज कपूर जी की क्लासिक फ़िल्म 'मेरा नाम जोकर' का यह लेजेंडेरी गाना सुना, बहुत अरसे बाद. और सच मानिए रोंगटे खड़े हो गए. ज़िंदगी के दाँव पेंच को कितने रोचक अन्दाज़ में बयान किया है साहित्यकार गोपालदास नीरज जी ने :-
ऐ भाई ज़रा देख के चलो
आगे ही नहीं पीछे भी
दाएँ ही नहीं बाएँ भी
ऊपर ही नहीं नीचे भी
ऐ भाई....
वो तेरा
घर नहीं गाँव नहीं
गली नहीं कूँचा नहीं
रास्ता नहीं बस्ती नहीं
दुनिया है
और प्यारे दुनिया ये सर्कस है
और सर्कस में
बड़े को भी छोटे को भी
खरे को भी खोटे को भी
पतले को भी मोटे को भी
ऊपर से नीचे को
नीचे से ऊपर को
आना जाना पड़ता है
और रिंग मास्टर के कोड़े पर
कोड़ा जो भूख है
कोड़ा जो पैसा है
कोड़ा जो क़िस्मत है
तरह तरह नाच के दिखाना यहाँ पड़ता है
बार बार रोना और गाना यहाँ पड़ता है
हीरो से जोकर बन जाना पड़ता है
ऐ भाई...
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