मेट्रो, मंडी हाउस और मैं !

मंडी हाउस के मेट्रो स्टेशन पर एग्ज़िट नम्बर एक से बाहर निकले हम दोनों। बाहर निकलते ही हिमाचल भवन पड़ता है। जिसके ठीक बाहर एक फेरी वाली बुढ़िया बैठती है। दोपहर के क़रीब साढ़े बारह बजे का वक़्त था । तेज़ धूप और गरमी भरा दिन। फेरी वाली को देखते ही हम थोड़े मुस्कुराए। अब आप सोचते होंगे कि फेरी वालों में आख़िर क्या अनोखा हो सकता है जिससे हमारा ध्यान उस बुढ़िया की ओर खिंचा और हम मुस्कुरा दिए? क़रीब सत्तर बरस की ग़रीब महिला, ताज़े हरे खीरों की टोकरी लिए बैठी थी। साँवला रंग, ढीली कमज़ोर खाल, टूटे हुए दाँत, सर पे गुंजल पड़े सफ़ेद बाल, बदन पर एक पुरानी नीली साड़ी और आँखों पर काले एवीएटर चश्मे जिनका फ़्रेम सुनहरे रंग का था। आंटी देखने में ही किसी कल्ट फ़िल्म का सीन लग रहीं थीं। हमसे रहा न गया और हम उनके पास जाके बैठ गये। शायद वो हमारा यही रीऐक्शन इक्स्पेक्ट कर रहीं थीं। हो सकता है हमसे पहले न जाने कितने और लोग उनको देखकर रुकते रहे हों। उनके लिए यह नयी बात नहीं थी। मैंने आंटी से पूछा कहाँ की रहने वाली हो आंटी? वह बोली बुलन्दशहर की। हम लोगों में बातचीत चलती रही। मैंने पूछा एक सेल्फ़ी ले लूँ आपके साथ? बस इसी बात का शायद इंतज़ार कर रहीं थीं आंटी। वह इतरा कर बोलीं वैसे तो मैं सेल्फ़ी के सौ रुपये लेती हूँ लेकिन अब चूँकि तू मेरी दोस्त बन गयी है इसलिए पचास दे दीजो। मैंने सोचा ये लो भैया यहाँ भी लूटूपंती? पर मैंने उनकी नाजायज़ माँग को ज़्यादा बड़ी बात न मानते हुए और परोपकार से ख़ुद को पैसिफ़ाई करते हुए ज़्यादा कुछ नहीं सोचा और उनको पचास रुपए देके एक मज़ेदार सेल्फ़ी ले ली। अब देखना यह है कि मंडी हाउस तो मुझे कल से रोज़ ही जाना होगा। परोपकार यूँही चलता है या नहीं। 

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