हँसोड़ का झगड़ा

चलिए शुरू करते हैं एक नया सफ़र. 
आज ही का क़िस्सा है - आजकल अपना मूड बहुत ग़मगीन रहता है. सूनेपन से लदा हुआ दिन होता है और रात दस बजे ही आँखों का शटर बंद कर दिया जाता है ताकि किसी तरह नींद आए और कुछ घंटों को मुक्ति मिले इस मुए मन से. ऐसा क्यूँ है यह ज़ाहिर है कोई जज़्बाती वजह ही होगी. ख़ैर जाने दीजिए. ज़रूरी नहीं है. क़िस्से पर आती हूँ - हुआ यूँ कि मैंने किसी सुबह ही ट्विटर पर पढ़ा कि कपिल शर्मा और सुनील ग्रोवर की झड़प हो गयी. इस पर कपिल शर्मा ने ट्विटर पर ही माफ़ीनामा पेश किया है और सुलह करने की पहल की है. चलो गुड. सुनील ग्रोवर फ़िलहाल माफ़ी स्वीकारने के क़तई मूड में नहीं दिखते. इक्स्पेक्टेड है और सही है. 
जब से मैंने इस घटना के बारे में पढ़ा है मैं एक ही बात सोच रही हूँ - ग़लती करते समय क्या हम अपने ग़ुस्से में इतने जकड़ जाते हैं कि हमें परिणाम का इल्म नहीं रहता और क्या माफ़ी माँगने से किसी का सम्मान लौटाया जा सकता है ? किसी के समकक्ष होके उसके गाल पर थप्पड़ मारके, फिर ट्विटर की वर्चूअल दुनिया पर माफ़ी माँगना ऐसा ही है जैसे कोई आपको यूट्यूब पर केक बनाने वाला विडीओ दिखाकर बोले कि उसने आपको केक खिलाया है. अत्यंत मूर्खतापूर्ण मूव. कपिल जी जिस बेलिहाज अन्दाज़ में आपने सम्मान को ठेस पहुँचाई है उसी अन्दाज़ में माफ़ी माँगना भी सीखिए तब शायद आपको कुछ खोया हुआ वापस मिल जाए ! 

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