इश्क़ का ख़तरनाक साइड इफ़ेक्ट
अगर ज़िंदगी में किसी के होते हुए भी अकेलापन लगे, डर सताए तो समझ जाना चाहिए कि ख़ुद को खो चुके हैं हम . यह ठीक नहीं है. इश्क़ अपनी जगह होना चाहिए और खुदी अपनी जगह . ख़ुद को खो देना बहुत ख़तरनाक हो सकता है . क्योंकि ख़ुद से बिछड़ कर इंसान कैसे जिएगा ? किस तरफ़ मुड़ेगा ? कौन उसको सहारा देगा जब अपना छोड़ जाएगा. हर तरफ़ अँधेरा छाएगा ? ख़ुद का साथ बहुत बहुत ज़रूरी है .
सच है प्यार में ख़ुद को खोना ही पाना है . लेकिन हम ग़ालिब तो हैं नहीं कि बेख़ौफ़ होके इंतज़ार में मरें और ताबड़तोड़ उम्दा शायरी करें. जी हमारा इश्क़ तो अंजाम माँगता है, किनारा ढूँढता है, इसे तो ठंडे पानी की बूँद चाहिए जो जलती रूह को तर कर जाए. आफ़त हुई जो प्यार कर बैठे , मगर अब तो कर लिया है . मोह हो चुका है, अपना अस्तित्व खो चुका है , अब तो बस भूखे मछुआरे की तरह भरे समंदर में टकटकी लगाए बैठे हैं हम , कि कब मछली काँटा निगले तो अपनी भूख शांत हो. और वो जो आसपास के झींगुर फुदक रहे हैं उनपर ध्यान नहीं जाता. हमें तो मच्छी ही चाहिए . नहीं मिली तो भूखों मर जाएँगे लेकिन मच्छी ही खाएँगे. अब मरेंगे या जीएँगे इसी कश्मकश और ख़ौफ़ में बैठे हैं बस . दिन गिन रहे हैं. मगर इससे पहले भी हम बेख़ौफ़ ही थे. मौज किया करते थे, जो मिला खा लेते थे और ज़िंदा रहने का फ़लसफ़ा ही क्या है ? जैसी भी हो दिल भर के जियो . तब ख़ुश रहोगे . अब क्या हालात हैं , कि डरे बैठे हैं ज़िंदगी से . चाहे बदनाम हो जाएँ मिट्टी कर लें ख़ुद को लेकिन साहब हमें तो मच्छी ही चाहिए !!
सच है प्यार में ख़ुद को खोना ही पाना है . लेकिन हम ग़ालिब तो हैं नहीं कि बेख़ौफ़ होके इंतज़ार में मरें और ताबड़तोड़ उम्दा शायरी करें. जी हमारा इश्क़ तो अंजाम माँगता है, किनारा ढूँढता है, इसे तो ठंडे पानी की बूँद चाहिए जो जलती रूह को तर कर जाए. आफ़त हुई जो प्यार कर बैठे , मगर अब तो कर लिया है . मोह हो चुका है, अपना अस्तित्व खो चुका है , अब तो बस भूखे मछुआरे की तरह भरे समंदर में टकटकी लगाए बैठे हैं हम , कि कब मछली काँटा निगले तो अपनी भूख शांत हो. और वो जो आसपास के झींगुर फुदक रहे हैं उनपर ध्यान नहीं जाता. हमें तो मच्छी ही चाहिए . नहीं मिली तो भूखों मर जाएँगे लेकिन मच्छी ही खाएँगे. अब मरेंगे या जीएँगे इसी कश्मकश और ख़ौफ़ में बैठे हैं बस . दिन गिन रहे हैं. मगर इससे पहले भी हम बेख़ौफ़ ही थे. मौज किया करते थे, जो मिला खा लेते थे और ज़िंदा रहने का फ़लसफ़ा ही क्या है ? जैसी भी हो दिल भर के जियो . तब ख़ुश रहोगे . अब क्या हालात हैं , कि डरे बैठे हैं ज़िंदगी से . चाहे बदनाम हो जाएँ मिट्टी कर लें ख़ुद को लेकिन साहब हमें तो मच्छी ही चाहिए !!
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